चम्तकारी जडी बूटीयां

हमारे हिन्दु धर्म  के अगनि पुराण जैसे ग्रंथों मे हजरों चम्तकारिक जडी बूटियों क वर्नण मिलता है जो चम्तकार करती है व मान्व जीवन मे उपयोगी साबित हुई है इनमें से कुछ जडी बूटीओ का वर्नण किया जा रहा है

  म्रत्युन्जय-योग

300  वर्ष की आयु प्राप्त करने  व सभी रोगों से छुटकारा पाने के लिए
: मधु (-honey), त्रिफला, घृत (-clarified butter), गिलोय। का इसतेमाल करें।

 Cure for all diseases, extends life span up to 300 years.

500 साल तक आयु प्राप्त करने के लिए : बिल्व-तैल  का नस्य/नसवार आयु 500साल तक बढ़ाता है| Extends age upto 500 years.

त्रिफला  4 तोले , 2 तोले , या  1 तोले  :  Extends age upto 500 years. (Tola-measure for weighing around 40 grams).

500 वर्ष की आयु: बिल्व तैल का नस्य एक मास तक लेने से 500 वर्ष की आयु प्राप्त होती है।  Its use extends age upto 500 years.

अपमृत्यु और वृद्धावास्था :भिलावा और तिल  का सेवन रोग, अपमृत्यु और वृद्धावास्था  को दूर करता है।
 वाचुकी के पञ्चांग  के चूर्ण को खैर  (कत्था )-के क्वाथ के साथ 6 माह  तक प्रयोग करने से कुष्ठ पर काबू हो जाता है।
100 साल की आयु: खांड युक्त दूध पीने से।  Drinking of milk with raw sugar enhances longevity to 100 years.
सौ वर्ष की आयु : शर्करा, सैन्धव और सौंठ के साथ अथवा पीपल, मधु, एवं गुड़ के साथ प्रति दिन दो हर्रे का सेवन करें।
 मृत्यु पर विजय: 4  तोले मधु , घी ,सोंठ  की 4  तोले  की मात्रा का  प्रति दिन प्रातः काल उपयोग  करने से व्यक्ति मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है।  Anyone who consumes around 40 grams of honey,ghee,sonth (-dried powdered ginger), every day in the morning wins death.
 
झुर्रियां व बाल सफ़ेद पर रोक : ब्राह्मी चूर्ण के साथ दूध का सेवन करने चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़तीं और बाल सफ़ेद नहीं होते व आयु वृद्धि होती है। Use of Brahmi(-Bac0pa monnieri) powder with milk protect against wrinkle formation and graying of hair, in addition of boosting of age.

 मृत्यु पर विजय :
मधु(-honey-Mel despumatus) के साथ उच्चटा (भुईं आंवला ) को एक तोले की मात्रा में खाकर दुग्धपान करने वाला मनुष्य मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। Death is  conquered  by the use of this combination,regularly.
5 सौ वर्ष आयु : पलाश -तैल का मधु के साथ,1 तोले, दूध के साथ प्रति दिन 6 मास तक सेवन करने से आयु 5 सौ वर्ष हो जाती है।
कांगनी के पत्तों का रस या त्रिफला दूध के साथ लेने से 1 हजार वर्ष की आयु प्राप्त होती है।
हजारों वर्ष की आयु : 4 तोले शतावरी-चूर्ण (-powdered Asparagus racemosus), घृत व मधु के साथ लेने से हजारों वर्ष की आयु प्राप्त होती है।

 मृत्यु का नाश : मेउड़ की जड़ का चूर्ण या पत्र स्वरस रोग एवं मृत्यु का नाश करता है ।

अमर होने के लिए: नीम (-Azadirachta indica) के पंचांग-चूर्ण को ख़ैर के क्वाथ (काढ़ा) की भावना देकर भृंगराज (-Eclipta alba) के रस  साथ एक तोला भर सेवन करने से मनुष्य सभी रोगों से जीत कर अमर हो सकता है।
मृत्यु विजय : रुदन्तिका चूर्ण घृत और मधु के साथ सेवन करने से या केवल दुग्धाहार से मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है।

हरीतकी चूर्ण भृंगराज रस की भावना देकर एक तोले की मात्रा में घृत और मधु के साथ सेवन करने वाला रोगमुक्त होकर तीन सौ साल की उम्र तक जीता है।

पाँच सौ साल की आयु : ताम्र भस्म, गिलोय, शुद्ध गंधक को सामान भाग घी कुंवार के रस में घोंट कर दो-दो रत्ती की गोलियां बनायें। इनका सेवन घृत के साथ करने से पाँच सौ साल की आयु प्राप्त होती है।

पांच सौ वर्ष की आयु : गेठी, लोह चूर्ण, शतावरी को समान भाग से भृंगराज रस तथा घी के साथ लेने से पांच सौ वर्ष की आयु प्राप्त होती है।
तीन सौ वर्ष की आयु : लौह भस्म व शतावरी को भृंगराज रसमें भावना देकर मधु व घी के साथ लेने से तीन सौ वर्ष की आयु प्राप्त होती है।

सौ साल तक आयु : असगन्ध, त्रिफला,चीनी,तैल, घृत में सेवन करने वाला सौ साल तक जिन्दा रह सकता है।

शतायु : गदहपूर्ना  का चूर्ण एक पल मधु, घृत और दुग्ध के साथ खाने वाला शतायु होता है।

अशोक की छाल का एक पल चूर्ण मधु और घृत के साथ दुग्धपान करने से रोग नाश होता है।

सौ साल तक आयु :निम्ब के  तैल की मधु सहित नस्य लेने से मनुष्य सौ साल जीता है और उसके बाल हमेशां काले बने रहते हैं।

सौ साल तक आयु :बहेड़े के चूर्ण को एक तोला मात्रा में शहद , घी और दूध के साथ पीने वाला शतायु होता है।

सौ साल तक आयु :बहेड़े के चूर्ण को एक तोला शहद, घी, और दूध पीने वाला शतायु होता है ।

सौ वर्ष तक की आयु :पिप्पली युक्त त्रिफला, मधु और घृत के साथ।

एक सहस्त्र वर्ष की आयु : पथे के एक पल चूर्ण को मधु घृत और दूध के साथ सेवन करते हुए दुग्धान्न का भोजन करने वाला निरोग रहकर एक सहस्त्र वर्ष की आयु का उपभोग करता है।
सौ वर्ष की आयु : कमल गन्ध का चूर्ण भांगरे  के रस की भावना देकर मधु और घृत की साथ लेने पर सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है।

दो सौ वर्ष की आयु : कड़वी तुम्बी के एक तोले भर तैल का नस्य दो सौ वषों की आयु प्रदान करता है ।

तीन सौ वर्ष की आयु :- त्रिफला,पीपल और सौंठ का प्रयोग तीन सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है।

सहस्त्र वर्ष की आयु :शतावरी का त्रिफला, पीपल और सौंठ का प्रयोग सहस्त्र वर्ष की आयु व अत्यधिक बल प्रदान करता है।

तीन सौ वर्ष की आयु :- त्रिफला, पीपल और सौंठ का चित्रक के साथ प्रयोग भी तीन सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है।

सौंठ का चित्रक व विडंग के साथ प्रयोग भी लम्बी आयु दायक है।

त्रिफला, पीपल, सौंठ का लोह, भृंगराज, खरेटी, निम्ब-पञ्चांग, ख़ैर, निर्गुण्डी, कटेरी, अडूसा और पुनर्नवा के साथ या इनके रस की भावना देकर या इनके संयोग से बटी या चूर्ण बनाकर उसका घृत, मधु, गुड़ और जलादि के साथ सेवन करने से लम्बी उम्र की प्राप्ति होती है।
वात ज्वर : बिल्वादि पंचमूल-बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटन, एवं अरणी का काढ़ा प्रयोग करें।
पाचन : पिप्पली मूल, गिलोय और सोंठ का क्वाथ प्रयोग करें।
ज्वर : आंवला, अभया (बडी हरड ), पीपल और चित्रक-यह आमल क्यादि  क्वाथ सब प्रकार के ज्वर का नाश करता है।

खांसी, ज्वर , अपाचन, पार्श्व शूल, और कास (खाँसी ) : दश मूल – बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा, गम्भारी, पाटल, शालपर्णी, गोखुरू, पृष्टपर्णी, बृहती, (बड़ी कटेरी) का क्वाथ व कुश के मूल का क्वाथ-प्रयोग करें। Cough associated with fever, indigestion, extreme one side stomach pain.

वात और पित्त ज्वर :- गिलोय, पित्त पापड़ा, नगर मोथा, चिरायता, सौंठ-यह पञ्च भद्र क्वाथ, वात और पित्त ज्वर में देना चाहिये।
विरेचक व सम्पूर्ण ज्वर नाष्क :- निशोथ, इंद्राय्ण (इंद्र वारुणी ), कुटकी, त्रिफला, अमलतास का क्वाथ यवक्षार मिला कर पिलायें।

सभी प्रकार के कास रोग (खांसी ): देवदारु,खरेठी, अडूसा, त्रिफला, व्योष (सौंठ,काली मिर्च, पीपल), पद्मकाष्ठ वाय विडंग और मिश्री सभी सामान भाग में A  combination of these in equal quantity cures 5 different kinds of cough.

ह्रदय रोग, गृहणी, हिक्का, श्र्वाष, पार्श्व रोग व कास रोग :  दशमूल,कचूर, रास्ना, पीपल, बिल्व, पोकर मूल, काकड़ा सिंगी, भुई आंवला, भार्गी, गिलोय और पान इनसे विधि वत सिद्ध किया हुआ क्वाथ या यवागू का पान करें। Heart trouble, hiccups, pain in one side of stomach, cough, breathing.
हिक्का -हिचकी रोग : मुलहठी(चूर्ण), के साथ पीपल, गुड के साथ नागर, और तीनों नमक (सैं धा  नमक, विड नमक, काला नमक)।

अरुचि रोग: कारवी अजाजी (काला जीरा-सफ़ेद जीरा), काली मिर्च, मुन्नका, वृक्षाम्ल (इमली), अनारदाना, काला नमक और गुड़, इन्हें सामान भाग में मिला कर चूर्ण को शहद के साथ निर्मित कारव्यादी बटी  का सेवन करें।

अरुचि,Lose of taste कास रोग (खांसी ), श्र्वाष, प्रति श्याय (जुकाम) और कफ विकार : अदरक के रस के साथ मधु इनका  का नाश करते हैं। Lose of taste, cough, difficulty in breathing, sneezing.

प्यास और वमन -उल्टी : वट-वटा ङ्कुर, काकड़ा सींगी,  शिलाजीत, लोध, अनारदाना और मुलहटी के चूर्ण में सामान भाग में मिश्री मिला कर मधु के साथ अवलेह (चटनी) बनायें तथा चावल के पानी के साथ लें।  Thirst, vomiting.

कफ युक्त रक्त, प्यास, खांसी एवं ज्वर : गिलोय, अडूसा, लोध और पीपलको शहद के साथ प्रयोग करें।  Fever, cough, thirst and sputum with blood.

कास (बल्गमी खांसी) अदुसे का रस, मधु और ताम्र भस्म सामान मात्र में लें।cough

सर्प विष व कास : शिरीष पुष्प  के स्वर रस में भावित सफेद मिर्च लाभ प्रद हैं। snake poison and cough

वेदना-दर्द-पीड़ा : मसूर सभी प्रकार की वेदना को नष्ट करता है। Pains cure

पित्त दोष : चौंराई का साग सभी प्रकार के पित दोश को नाश करता है।


विष नाशक : मेउड़, शारिवा, सेरू  और अङ्कोल। Poison cure


मूर्छा, मदात्यय रोग (बेहोशी) : सौंठ, गिलोय, छोटी कटेरी, पोकर मूल, पीपला मूल और पीपल का क्वाथ।


उन्माद : हींग, काला नमक एवं व्योष (सौंठ,मिर्च,पीपल), ये सब दो दो पल लेकर 4 सेर घृत और घृत  से 4 गुनी मात्रा  में गौ मूत्र में सिद्ध करने पर  प्रयोग करें।


उन्मादऔर अपस्मार रोग का नाश व मेधा वर्धक : शंख पुष्पी, वच, और मीठा कूट से सिद्ध ब्राह्मी रस को मिला कर इनकी गुटिका बना लें




चम्तकारी जडी बूटीयां  


Leprosy कुष्ठ रोग कुष्ठ रोग मर्दन : परवल की पत्ती , त्रिफला, नीम की छाल, गिलोय, पृश्र्निपर्णी, अडूसे  के पत्ते के साथ तथा करज्ज -इनको सिद्ध करने वाला घृत। यह वज्रक कहलाता है।

कुष्ठ नाशक
: हर्रे के साथ पंचगव्य या घृत का प्रयोग।

कुष्ठ नाशक,
अस्सी प्रकार के वात रोग, चालीस प्रकार के पित्त रोग,और बीस प्रकार के क़फ़ रोग ,खांसी, पीनस (बिगड़ा जुकाम ), बबासीर और व्रण रोगों का नाश यह योगराज करता है : नीम की छाल, परवल, कंटकारी-पंचांग, गिलोय और अडूसा-इन सबको दस दस पल लेकर कूट लें । 16 सेर पानी में क्वाथ बनाकर उसमें सेर भर घृत और 2 0 तोले त्रिफला चूर्ण का कल्क बनाकर डाल दें और चतुर्थांश शेष रहने तक पकाएं।

Piles (-बबासीर ) अर्श रोग :त्रिकुट युक्त घृत को तिगुने पलाश भस्म -युक्त जल में सिद्ध करके पीना है।

उपदंश की शांति : त्रिफला के क्वाथ या भ्रंग राज के रस से व्र णों को धोयें। परवल की पत्ती के चूर्ण  के साथ अनार की छाल या गज पीपर या त्रिफला का चूर्ण उस पर छोड़ें ।
वमन(कै या उल्टी) : त्रिफला, लोह्चूर्ण, मुलहटी, आर्कव, (कुकुरमांगरा ), नील कमल, कालि मिर्च और सैन्धव नमक सहित पकाये हुए तैल  के मर्दन से वमन की शांति होती है ।

वमन कारक : मुलहठी, बच, पिप्पली-बीज, कुरैया की छाल का कल्क और नीम का क्वाथ घौंट देने वमन कारक होता है।

बाल पकने-सफ़ेद होने से रोकना : दूध, मार्कव-रस, मुलहटी और नील कमल, इनकी दो सेर मात्रा को  पका  कर एक पाव तैल में बदल कर नस्य का प्रयोग करें। Prevents graying of hair.

ज्वर, कुष्ठ, फोड़ा, फुंसी, चकत्ते: नीम की छाल, परवल की पत्ती , गिलोय, खैर की छाल , अडूसा या चिरायता, पाठा , त्रिफला और लाल चन्दन। Fever, leprosy, boils, spots.

ज्वर और विस्फोटक रोग : परवल की पत्ती, गिलोय, चिरायता, अडूसा, मजीठ एवं पित्त पापड़ा-इनके क्वाथ में खदिर मिलाकर लिया जाये।

ज्वर, विद्रधि तथा शोथ : दश मूल, गिलोय, हर्रे, गधह पूर्णा , सहजना  एवं सौंठ ।

व्रण शोधक : महुआ और नीम की पत्ती  का लेप ।
बाह्य शोधन : त्रिफला (हेड़, बहेड़ा, आंवला), खैर (कत्था), दारू हल्दी, बरगद की छाल , बरियार, कुशा, नीम की पत्ते तथा मूली के पत्ते का क्वाथ।

घाव के क्रमि नष्ट करना: करंज , नीम, और मेउड़  का रस। Destruction of worms in wound.

व्रण रोपण : धय का फूल, सफ़ेद चन्दन, खरेठी , मजीठ , मुलहठी, कमल, देवदारु, तथा मेद घाव को भरने वाले हैं ।

नाड़ी व्रण, दुष्ट व्रण, शूल और भगन्दर : गुग्गुल, त्रिफला, पीपल, सौंठ, मिर्च, पीपर  इन सबको समान भाग में पीस कर घृत में मिला कर प्रयोग करें।
कफ और वात रोग : गौ मूत्र में भिगोकर शुद्ध की हुई हरीतकी (छोटी हर्र) को रेडी के तेल में भून कर सैंधा नमक के साथ प्रात प्रति दिन प्रयोग करें। ऐसी हरितकी कफ व वात से होने वाले रोगों को नष्ट करती है।

कफ प्रधान व वात प्रधान प्रकृति वाले मनुष्यों के लिए : सौंठ,मिर्च,पीपल और त्रिफला का क्वाथ यवक्षार और लवण मिलाकर पीने से विरेचन का काम करता है और  कफ वृधि को रोकता है।

आम वात नाशक : पीपल, पीपला मूल , वच , चित्रक व सौंठ का क्वाथ या पेय बनाकर पियें।

वात एवं संधि, अस्थि एवं मज्जा गत, आमवात : रास्ना, गिलोय, रेंडकी की छाल, देवदारु,और सौंठ का क्वाथ में पीना चाहिये अथवा सौंठ के जल के साथ दशमूल का क्वाथ पीना चाहिये।

आम वात, कटिशूल और पांडु रोग : सौंठ,एवं गोखरू का क्वाथ प्रतिदिन प्रात: सेवन करना है। शाखा एवं पत्र सहित प्रसारिणी (छुई मुई ) का तैल भी इस रोग में लाभप्रद है।

वातरक्त रोग : गिलोय का स्वरस, कल्क , चूर्ण या क्वाथ का दीर्घ कल तक प्रयोग।

वातरक्त नाशक
: वर्धमान पिप्पली या गुड़ के साथ हर्रे का सेवन करना चाहिए।

वातरक्त-दाहयुक्त रोग : पटोल्पत्र, त्रिफला, राई, कुटकी, और गिलोय का पाक तैयार करें।

वातजनित पीड़ा : गुग्गुल को ठन्डे-गरम जल से, त्रिफला को सम शीतोष्ण जल से अथवा खरेठी, पुनर्नवा, एरंड मूल, दोनों कटेरी, गोखरू, का क्वाथ, हींग  तथा लवण  के साथ। एक तोला पीपला मूल,सैन्धव , सौवर्चल, विड्, सामुद्र एवं औद्भिद-पाँचों नमक, पिप्पली,चित्ता, सौंठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, शीतला, दंती, स्वर्ण क्षीरी(सत्य नाशी) और काकड़ा सिंगी -इनकी बेर के बराबर गुटिका बनायें और कांजी के साथ सेवन करें -शोथ तथा उससे हुए में भी इसका सेवन करें । उदर वृद्धि में निशोथ का प्रयोग न करें।

शोथ नाशक : दारू हल्दी, पुनर्नवा तथा सौंठ-इनसे सिद्ध किया हुआ दूध।

शोथ का हरण : मदार, पुनर्नवा (-गदह्पुर्ना) एवं चिरायता के क्वाथ से सेंक करने पर।

गलगंड और गलगंड माल : फूल प्रियंगु, कमल, सँभालू, वायविडंग, चित्रक, सैंधव लवण, रास्ना, दुग्ध, देवदारु और वच से सिद्ध चौगुना कटु द्रव्य युक्त तैल मर्दन करने से (या जल के साथ ही पीसकर लेप करने से)।

टी.बी या क्षय रोग : कचूर,नागकेसर, कुमुद का पकाया हुआ क्वाथ तथा क्षीर विदारी,पीपल और अडूसा का कल्क दूध के साथ पका कर लेने से लाभ होता है।

गुल्म रोग, उदर रोग, शूल और कास रोग: वचा, विडलवण,अभया (बड़ी हर्रे), सौंठ,हींग, कूठ ,चित्रक और अजवाइन, इनके क्रमश: दो, तीन, छ:, चार, एक, सात, पाँच और चार भाग ग्रहण करके चूर्ण बनायें।

गुल्म और पलीहा : पाठा, दन्ती  मूल, त्रिकटु (सौंठ,मिर्च, पीपल) त्रिफला और चित्ता  का चूर्ण गौमूत्र के पीस कर गुटिका बनालें ।

कृमि नाशक : वाय विडंग का चूर्ण शहद के साथ।  या विडंग, सैंधा नमक, यव क्षार एवं गौमूत्र के साथ हर्रे भी लेने पर।

रक्तातिसार :
शल्लकी (शाल विशेष ), बेर, जामुन, प्रियाल, आम्र और अर्जुन -इन वृक्षौं की छाल का चूर्ण बना कर मधु में मिला कर दूध के साथ लेना है।

Dysentery, diarrhoea अतिसार :
कच्चे बेल का सूखा गूदा, आम की छाल, धाय का फूल, पाठा, सौंठ और मोच रस (कदली स्वरस )-इन सबका समान भाग लेकर चूर्ण बना लें गुड मिश्रित तक्र के साथ पीयें।

 गुद  भ्रंश रोग : चान्गेरी, बेर, दही का पानी, सौंठ और यवक्षार-इनका घृत सही क्वाथ पीने से।

प्रदर रोग : मजीठ, धाय के फूल, लोध, नील कमल-इनको दूध के साथ स्त्रियों को लेना चाहिये।

 प्रदर रोग नाशक
: पीली कट सरैया, मुलहठी और चन्दन ।

गर्भ स्थिर करना : श्वेत कमल  और नील कमल की जड़ तथा मुलहठी , शर्करा और तिल-इनका चूर्ण का इसतेमाल करने से गर्भपात की आशंका होने पर गर्भ को स्थिर करने में सहायक है ।

शिरो रोग का नाश
: देव दारू, अभ्रक, कूठ, खस और सौंठ-इनको कांजी में पीस कर तैल मिला कर, लैप करने से शिरोरोग का नाश होता है ।

कर्ण शूल शमन : सैन्धव-लवण को तैल में सिद्ध करके छान लें -हल्का गरम तैल कान में डालने से फायदा होगा ।

कर्णशूल हारी : लहसुन, अदरक, सहजन और केला -इनमें से प्रत्येक का रस कर्णशूल हारी है।

तिमिर रोग नाशक : बरियार, शतावरी, रास्ना, गिलोय, कटसरैया और त्रिफला-इनको सिद्ध करके घृत का पान या इनके सहित घृत का उपयोग।

आँखों (-चक्षुश्य), ह्रदय, विरेचक और कफ रोग नाशक  :  (  त्रिफला, त्रिकुट एवं सेंधव नमक -इनसे सिद्ध किये हुए घृत का पान-आँखों, ह्रदय, विरेचक और कफ रोग नाशक – के लिए हितकर है।

दिनौंधी, रतौंधी :
गाय के गोबर के रस के साथ नील कमल के पराग की गुटिका का अंजन ।

सर्व रोग नाशक चूर्ण व विरेचक : 
हर्रे, सैन्धव लवण और पीपल -इनके समान भाग का चूर्ण गर्म जल के साथ लें । यह नाराच -संज्ञक चूर्ण सर्व रोग नाशक है ।

टीबी के रोग का इलाज

(mycobacterium tuberculosis)टीबी के रोग को तपेदिक, क्षय,यक्षमा आदि कई नामों से जाना जाता है। तपेदिक संक्रामक रोग है जो माइकोबैक्टिरीअम टूबर्क्यूलोसस (mycobacterium tuberculosis) नामक जीवाणु के कारण होता है। तपेदिक के मूल लक्षणों में खाँसी का तीन हफ़्तों से ज़्यादा  रहना, थूक का रंग बदल जाना या उसमें रक्त की आभा नजर आना, बुखार, थकान, सीने में दर्द, भूख कम लगना, साँस लेते वक्त या खाँसते वक्त दर्द का अनुभव होना आदि। टीबी के बीमारी से घबराने की ज़रूरत नहीं है, इसका इलाज संभव है।  इस बीमारी से टीकाकरण या साफ सफाई रखने से बचा जा सकता है। यक्षमा के रोगी का इलाज संभव है लेकिन इसका इलाज पूरी तरह से करना चाहिए, आधा करके नहीं छोड़ना चाहिए, वरना ये रोग जानलेवा भी हो सकता है।

तपेदिक रोग होने के कारण व पूर्ण उप्चार


तपेदिक या टीबी कोई आनुवांशिक (hereditary) रोग नहीं है।यह रोग किसी को भी हो सकता है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति तपेदिक रोगी के पास जाता है और उसके खाँसने, छींकने से जो जीवाणु हवा में फैल जाते हैं उसको स्वस्थ व्यक्ति साँस के द्वारा ग्रहण कर लेता है। इसके अलावा जो लोग अत्यधिक मात्रा में ध्रूमपान या शराब का सेवन करते हैं। उनमें इस रोग के पनप्ने की संभावना ज़्यादा होती है। इस रोग से बचने के लिए साफ-सफाई रखना और हाइजिन का ख्याल रखना बहुत ज़रूरी होता है।
किन लोगों को इस बीमारी के होने का खतरा ज़्यादा होता है-
जब किसी के शरीर का प्रतिरक्षी तंत्र (immunity system) कमजोर हो जाता है तब उसके इस रोग के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरण के रूप मे:
• कमजोर प्रतिरक्षी तंत्र वालों में- शिशु, वृ्द्ध व्यक्ति, गर्भवती महिला, डाइबीटिज , कैंसर और एच.आई.वी. रोगी आदि आते हैं जिनको इस बीमारी के होने का खतरा ज़्यादा होता है। साथ ही गंदगी वाली जगह पर भी इस बीमारी के होने का खतरा ज़्यादा होता है।
• इस बीमारी से ग्रस्त रोगी के पास जाने से या एक साथ काम करने से भी रोग के पनपने का खतरा बढ़ जाता है।
• शराब पीने वाले या नशा करने वालों को भी इस बीमारी का खतरा होता है।
 लक्षण 
अगर किसी को दो हफ्ते से ज़्यादा दिनों तक खाँसी हैं और ये सारे निम्नलिखित लक्षण नजर आ रहे हैं –
• बार-बार खाँसना
• रात में पसीना
• बुखार
• भूख में कमी
• सीने में दर्द
• खाँसते-खाँसते बलगम में खून का आना
• खाँसते और साँस लेते वक्त दर्द का एहसास
• थकान और कमजोरी का एहसास
• लिम्फ नोड्स की वृद्धि
• गले में सूजन
• पेट में गड़बड़ी
• अनियमित मासिक धर्म (irregular menstruation)
तो वह तुरन्त जाँच केंद्र में जाकर अपने थूक की जाँच करवायें और डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा प्रमाणित डॉट्स (DOTS- Directly Observed Treatment) के अंतगर्त अपना उपचार करवाकर पूरी तरह से ठीक होने की पहल करें। लेकिन एक बात का ध्यान रखने की ज़रूरत यह है कि टी.बी. का उपचार आधा करके नहीं छोड़ना चाहिए।
इस बीमारी का उपचार पूरी तरह से संभव है । अगर इस रोग का इलाज सही तरह से नहीं किया गया तो यह रोग लाइलाज हो सकता है व अंत में रोगी की जान जा सकती है।
इस रोग का पूर्ण उप्चार
आक के फ़ूल

सत मुलहठी,वंशलोचन,छोटी इलालची के दाने तीनों दस दस ग्राम, दालचीनी, कीकर का गोंद, कतीरा गोंद, तीनों चीजें 5 -5 ग्राम, व छोटी पीपल  2 ग्राम लेकर वारीक महीन कूट लें व इसको अंदाजन 20-30 ग्राम गाय के देसी घी में मसल कर इसमें 150 ग्राम शहद मिला कर रख लें।दवा काँच के जार में भर कर रखें।औषधि की मात्रा 2 से 3 ग्राम औषधि दिन में 2-3 बार प्रयोग करें वैसे तो इसे सभी प्रकार की टी.बी,त्पेदिक की खास दवा है इसके साथ साथ इस रोग की खाँसी में भी लाभ उठाया जा सकता है।

*तपेदिक रोग की खांसी या कोई अन्य खांसी नही जा रही हो तो आप बे हिचक हो कर कंटकारी

आक का केसर

अवलेह को इसतेमाल करें यह तो हो ही नही सकता कि  कंटकारी अवलेह  का इसतेमाल आपने किया हो ओर खांसी ठीक ना हो यह सूखी खाँसी की तो यह विशेष औषधि है।


उकत योग के साथ साथ इस रोग के लिये ब्रह्मस्त्र कही जाने वाली दवा का प्रयोग जरूर करना चाहिये जो निम्न्लिखित है:-

 आक का केसर जिसको आप फ़ोटो मे देख सकते है

पहले दिन एक केसर,दूसरे दिन दो,तीसरे दिन तीन ,फ़िर लगातार अगले 12 दिन तीन केसर लें। इस तरह 15 दिन तक हर रोज एक केसर सुबह खाली पेट चबा कर खाना है इसके बाक अगले 15 दिन बंद कर देना है एक माह पुरा हो जाने पर सभी अनिवार्य टैस्ट करवाने है।

आपका रोग जा चुका है मगर यह दवा आपके पूरे 3 माह तक रिपीट करनी है ।

इस दुनियां मे टी बी के रोग का जड मूल से नाश करने वाली पैदा नही हुई है।

यह अंतिम दशा मे जा चुके रोगी को भी प्राण फ़ूक सकती है ।इस औषध से वे निराश व हताश रोगी भी स्वस्थ हो जाते हैं जिनहोंने जीने की आस ही छोड दी थी बहुत ही अच्छी औषध है।


1- रोगी को गुड,चावल,ठंडी,चिकनी,खटाई युक्त चीजों का इसतेमाल बंद कर दें।

2- लहसुन को एंटीबायोटिक होता है इसको हर रोज के खाने मे शामिल करें इसके सेवन से टीबी के कीटाणु नष्ट करने में मदद मिलती है।
3- क्षय रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन तुलसी की 5 पत्तियां खाने को देनी चाहिए जिसके


फलस्वरूप इस रोग का प्रभाव कम हो जाता है।


4- क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए तथा कम से कम आधे घण्टे तक ताजी हवा में टहलना चाहिए।


6- क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को खाने के साथ पानी नहीं पीना चाहिए


बल्कि खाना खाने के लगभग 10 मिनट बाद पानी पीना चाहिए।


7- क्षय रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन बकरी का दूध पीने के लिए देना चाहिए क्योंकि बकरी के दूध में क्षय रोग के कीटाणुओं को नष्ट करने की शक्ति होती है।

कैंसर की जांच अब अल्ट्रासाउंड से भी होगी

कैंसर की जांच अब अल्ट्रासाउंड से भी होगीकलम का तिलक,नैटवर्क,लंदन-20जनवरी । वैज्ञानिकों ने गर्भाशय के कैंसर का पता लगाने वाली एक नई किस्म की अल्ट्रासाउंड जांच विकसित कर ले है, जिससे कैंसर के खतरे की सूचना पहले ही मिल जाएगी। बेल्जियम के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स लियूवेन में हुए शोध के मुख्य लेखक ड्रिक टिम्मरमैन कहते हैं, "पहले इस जांच से यूटरस के मरीजों की 20 से 25 प्रतिशत तक जांच पूरी नहीं हो पाती थी।"  उन्होंने बताया, "हमारा शोध दल इसकी जांच करने में सक्षम था। अब से यह नई विधि हर कैंसर पीड़ित की सटीक जांच करेगी। यह नया टेस्ट मरीज में ट्यूमर के रिस्क की जानकारी दे सकता है।"
यूटरस या गर्भाशय का कैंसर एक घातक बीमारी है। इसका समय से पता लगाकर, अगर इसका इलाज किया जाए, तो यह कारगर हो सकता है।

ड्रग रेसिस्टेंट बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ने के लिए लाइट-पावर्ड नैनोथेरेपी

ड्रग रेसिस्टेंट बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ने के लिए लाइट-पावर्ड नैनोथेरेपी का निर्माण किया गया है। ये सुपरबग्स जैसे एंटी-बायोटिक रेसिस्टेंट को असफल करने में मदद करेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस विधि में प्रयोग होने वाले लाइट-पावर्ड चिकित्सीय नैनोपार्टिकल्स को क्वांटम डॉट्स भी कहा जाता है। यह डॉट्स मानवों के बालों से 20 हजार गुना छोटे होते हैं। यह उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल होने वाले सेमीकंडक्टर्स के समान लगते हैं।
लेब के वातावरण में यह 92 प्रतिशत दवा प्रतिरोधी जीवाणु कोशिकाओं को नष्ट करने में सक्षम हैं। अमेरिका की कोलोरैडो बाउल्डर यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर और इस अध्ययन के सह-लेखक भारतीय मूल के प्रशांत नागपाल ने बताया कि “इन सेमीकंडक्टर्स के नैनोस्केल के सिकुड़ने से कोशिकाओं में एक विशिष्ट प्रतिक्रिया उत्पन्न की जा सकती है, जो केवल संक्रमित स्थानों को ही टार्गेट करेगी”। यह शोध पत्रिका 'नेचर मटीरियल्स' में प्रकाशित हुआ है।








 

डेंगू की चिकित्सा


आजकल डेंगू एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा है, जिससे कई लोगों की जान जा रही है l
डेंगू एक ऐसा वायरल रोग है जिसका मेडिकल चिकित्सा पद्धति में कोई इलाज ही नहीं है मगर इसको दबाय़ा जो सकता है । परन्तु आयुर्वेद में इसका इलाज है और वो इतना सरल और सस्ता है की उसे कोई भी कर सकता है l वायरल रोग डेंगू
तीव्र ज्वर, सर में तेज़ दर्द, आँखों के पीछे दर्द होना, उल्टियाँ लगना, त्वचा का सुखना तथा खून के प्लेटलेट की मात्रा का तेज़ी से कम होना डेंगू के कुछ लक्षण हैं जिनका यदि समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी सकती है l
यदि आपके किसी भी जानकार को यह रोग हुआ हो और खून में प्लेटलेट की संख्या कम होती जा रही हो तो चित्र में दिखाई गयी चार चीज़ें रोगी को दें :
1) अनार जूस
2) गेहूं घास रस
3) पपीते के पत्तों का रस
4) गिलोय/अमृता/अमरबेल सत्व

- अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है, अनार जूस आसानी से उपलब्ध है यदि गेहूं घास रस ना मिले तो रोगी को सेब का रस भी दिया जा सकता है l
- पपीते के पत्तों का रस सबसे महत्वपूर्ण है, पपीते का पेड़ आसानी से मिल जाता है उसकी ताज़ी पत्तियों का रस निकाल कर मरीज़ को दिन में 2 से 3 बार दें , एक दिन की खुराक के बाद ही प्लेटलेट की संक्या बढ़ने लगेगी l
- गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में 2-3 बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है l यदि गिलोय की बेल आपको ना मिले तो किसी भी नजदीकी पतंजली चिकित्सालय में जाकर "गिलोय घनवटी" ले आयें जिसकी एक एक गोली रोगी को दिन में 3 बार दें l

यदि बुखार एक दिन से ज्यादा रहे तो खून की जांच अवश्य करवा लें l
यदि रोगी बार बार उलटी करे तो सेब के रस में थोडा नीम्बू मिला कर रोगी को दें, उल्टियाँ बंद हो जाएंगी l
ये रोगी को अंग्रेजी दवाइयां दी जा रही है तब भी यह चीज़ें रोगी की बिना किसी डर के दी जा सकती हैं l
डेंगू जितना जल्दी पकड़ में आये उतना जल्दी उपचार आसान हो जाता है और रोग जल्दी ख़त्म होता है l
रोगी के खान पान का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि बिना खान पान कोई दवाई असर नहीं करती l

जामुन की कीमती लकड़ी

पानी की टंकी मे काई लग जाती है तो जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल या हरी काई नहीं जमती और पानी सड़ता नहीं है| टंकी को लम्बे समय तक साफ़ नहीं करना पड़ता |
पानी की टंकी मे काईजामुन की एक खासियत है कि इसकी लकड़ी पानी में काफी समय तक सड़ता नही है।जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।नाव का निचला सतह जो हमेशा पानी में रहता है वह जामून की लकड़ी होती है।
गांव देहात में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है। आजकल लोग जामुन का उपयोग घर बनाने में भी करने लगे है।
जामून के छाल का उपयोग श्वसन गलादर्द रक्तशुद्धि और अल्सर में किया जाता है।
दिल्ली के महरौली स्थित निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में जीर्णोद्धार हुआ है |700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ पानी के सोते बंद नहीं हुए हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।
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